24 मार्च 2010

"ईश्वर"

अक्सर, मन में ये विचार आता है,
कि, मनुष्य कहाँ से आता और किधर जाता है?

जीवन से पहले और मृत्यु के बाद क्या है ?
क्या आत्मा वोही पुरानी, सिर्फ चोला ही नया है ?

ईश्वर कौन है ,कहाँ है, कैसा है ?
रौशनी है, छाया है, या फिर इंसानों जैसा है ?

बुजुर्गों से सुना है, किताबों में पढ़ा है,
वो समय से पुराना और दूरियों से बड़ा है,

चलो माना धरती,  अम्बर, जीवों को उसने बनाया,
पर ख़ुद बना जिससे, वो स्रोत कहाँ से आया?

पहले पल से पहले, जब वो ही हुआ करता था,
हर तरफ कुछ न था, तो अकेला क्या करता था ?

इस तर्क वितर्क के जंगल में, यूँ ही भटके जाता हूँ,
तथ्य कहीं से मिले नहीं,  उसे मिथ्या भी मान न पाता हूँ,

ख़ुद ही सवाल करता, ख़ुद ही उत्तर गढ़ता हूँ,
प्रमाणों की खोज में, जाने क्या क्या पढ़ता हूँ,

ये उत्तर कहाँ से पाऊँ, कैसे ये रहस्य जानूं ?
प्रमाण से इश्वर परखूँ ,या श्रद्धा को ईश्वर मानूं ???

- योगेश शर्मा