22 मार्च 2010

"मैं ताज हूँ "




शाहजहाँ, तुम्हें याद है या भूल चुके हो
यूं तो बरसों पहले ये कबूल चुके हो
किया था प्यार मुझसे, मुमताज़ से भी बढ़ कर 
मुकम्मल किया मुझे था  इंसानियत से गिरके,

कब से मैं चुप खड़ा हूँ, अब सब्र नहीं है,
दामन में मेरे, दो ही तो कब्र नहीं हैं,
दफ़न हैं कितने हाथ यहाँ जिस्मों के बिना,
बरसों से  बार बार, जिन्हें पल पल मैंने गिना,

गढ़ा जिन्होंने मुझको, शिद्दत से था बनाया,
मेरे हरेक नक्श पर, अपना लहू बहाया,
ताबीर से मिलाया तेरे ख्वाब को जिन्होंने
भला कैसे था कटवाया हाथों को उन्हीं तूने ,

हर रोज़ गाये जाते हैं प्यार के तराने ,
चेहरा  निहारते मेरा, हैं सैकड़ों दीवाने,
रोज़ खाई जाती है, मेरी हज़ारों कसमें,
रखने को यादगार, होती तस्वीरों की रस्में,

है सब से ये गुजारिश , मुझे तन्हा छोड़ दो,
बरसाओ मुझपे पत्थर, या मुझको तोड़ दो,
हूँ सिर्फ संगमरमर, मुझमें है दिल नहीं ,
बनूँ प्यार की निशानी, मैं इस काबिल नहीं 


शाहजहाँ, तुम्हें याद है या भूल चुके हो
यूं तो बरसों पहले ये कबूल चुके हो...





- योगेश शर्मा