03 अप्रैल 2010

सुपुत्र....privacy... और मैं

( पेश है पुरानी पोस्ट फिर एक बार... कुछ संशोधन और.......नये, इम्प्रूव्ड नाम के साथ )

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मेरा यह मानना है कि मनुष्य सैधांतिक रूप से 'मंगतू' है और हम मांगने की आदत अपने खून में लिए हुए ही इस दुनिया में आते हैं | सुबह भगवान् से सुख मांगने से लेकर रात में नींद मांगने तक, बच्चे के पैदा होते ही दूध मांगने से लेकर खिलौने, पिज़्ज़ा, मोटर साईकल से होते हुए ज़मीन जायदाद में हिस्सा मांगने तक, लोगों का शादी के लिए हाथ मांगने से तलाक मांगने तक इत्यादी इत्यादी |

मैं पिछले एक साल से हैदराबाद में रह रहा हूँ, जहाँ अलग तेलंगाना प्रदेश बनाने की मांग ने जोर पकड़ा हुआ है |ये शहर कुछ महीनों से इसी के लिए होने वाले प्रदर्शनों, तोड़ फोड़ और बन्द से काफी प्रभावित हुआ है |
बाकी और किसी को भले इससे समस्या हो या न हो , बच्चा वर्ग इस से काफी खुश दिखाई देता था क्योंकि हैदराबाद बन्द के चलते अक्सर स्कूल कालेजों में छुट्टी हो जाती थी |


हमारे सुपुत्र भी, जो हमारे सर्कल में अपने दार्शनिक छाप सीरीयस लुक के लिए जाने जाते हैं, अपनी मर्यादाएँ तोड़ कर विशेष खिले खिले रहने लगे थे, क्योंकि जनाब का स्कूल बन्द था |
एक सुबह वे, ड्राइंग रूम में,अपना बैक टु स्क्वायर वन सीरिअस चेहरा लेकर दाखिल हुए जहां पर मैं, अपने आसन पर विराजमान हो, शान्ति पूर्वक अखब़ार का पठन कर रहा था |यह चेहरा कुछ वैसा ही था जो पुरानी हारर फिल्मों में हवेली के चौकीदार का होता था जो हीरो या हेरोइन रूपी मेहमान को देख कर लालटेन की रोशनी में सपाट चेहरे, और भाव विहीन आवाज़ में, कहता था "आज, बीस साल बाद इस हवेली में फिर कोई आया है " |

खैर एकाएक, भरी बसंत में पतझड़ का प्रभाव देखकर मैं थोड़ा चौंका, फिर ना चौंकने का बहाना सा करते हुए वापस अखबार पढ़ने लगा | मैंने ठान लिया था कि आज कुछ नहीं पूछूंगा.... लाडला ख़ुद ही बोलेगा कि क्या मर्ज़ है | साहबजादे, पहले तो काफी देर चुप चाप बैठे रहे, फिर कमरे में इधर उधर टहलने की कुछ कोशिश के बाद, मेरे करीब आकर बैठ गए और अजीब अजीब से मुंह बनाने लगे |
मुझे भी लगा कि टाईम बम में टाईमर ख़ुद ही सेट देना चाहिए, कम से कम मालूम तो चलेगा कब फटने वाला है, वरना ऐसे तो न जाने कब फट जाए | लिहाजा, मैं ख़ुद ही पूछ बैठा कि "बेटाजी कोई समस्या है?"
साहबज़ादे ने बड़े ट्रेजिक अंदाज में जवाब दिया "स्कूल से मैसेज आया है कि कल से स्कूल खुल रहे हैं " प्रत्युत्तर में मैंने राहत की सांस के साथ सिर्फ 'हूँ' कहा, जो असल में खुशी के मारे थोड़ा लम्बा खींचकर हूँहूँहूँ... जैसा बाहर आया था |

मैं, चूंकि वापस पेपर में घुस चुका था , तो उसने कुछ देर तो मुझे घूरा और फिर पूछा "पापा ये बन्द हो क्यों रहे हैं?' मैंने जवाब दिया "अलग तेलंगाना राज्य कि स्वायत्तता को लेकर बेटा "... उसने फिर पुछा कि "ये स्वायत्तता क्या होती है?" यह सवाल सुनते ही मेरे दिमाग में ठन.न.न करके एक छोटी आवाज़ हुई, जो खतरे की पहली किरन को देख कर अक्सर हो जाती है | हमारे देश का अमूमन हर पिता, अपने बच्चे की जिज्ञासू प्रवति को देख कर पहले गौरवान्वित, फिर खुश, फिर खीजने और अंत में परेशान होने लगता है |
मैं, लेकिन इस प्रक्रिया की हदबंदी तोड़ कर सीधा ही तीसरे पायदान पर पहुँच गया और थोड़ा खीजते हुए बोला "स्वायत्तता माने, स्थानीय शासन का अधिकार" |उसने मेरे चेहरे पर आ रहे खीज के भाव को पूरी तरह नज़रंदाज़ करते हुए आगे पूछा "इसका मतलब? " |मैंने एक नार्मल हिन्दोस्तानी पिता की तरह फिर उसे हिंदी का मतलब अंग्रेज़ी में समझाने की कोशिश में कहा " बेटा इसका मतलब है आटोनोमस सेल्फ गवर्नेन्स, यानी किसी हिस्से को वहां के लोकल लोगों द्वारा अपने हिसाब से अपने कंट्रोल में चलाने का अधिकार " |

बेटे ने भी ठान लिया था की वो मेरे और मेरे 'ऐश्वर्या' रूपी अखब़ार के बीच विलेन का काम करके ही मानेगा |उसने और एक नया प्रश्न दागा "फिर ये बन्द, बन्द क्यों हो गए"? मैंने कहा "सरकार की तरफ से आश्वासन दिया गया है कि इस दिशा में कदम आगे बढ़ाये जायेंगे.... इस लिए, बन्द कुछ समय को बन्द हो गए हैं"
यह सुन कर, वो कुछ देर शांत रहा, फिर थोड़ा आगे झुकते हुए उसने गब्बर के 'कितने आदमी थे?' वाले अंदाज़ में मुझसे पूछा "मुझे स्वायत्तता कब मिलेगी?" |मैं यहाँ पर वाकई चौंका और फिर थोड़ा संभलते हुए पूछ बैठा "किस बात की स्वायत्तता बेटा( माई बाप)"? |बेटा, बंसी बजैया कृष्ण वाली मुस्कान चेहरे पर लाकर बोला "मेरे कमरे की" |

मैं यहाँ ज़रा और चौंका, और यह चौंकना ठीक वैसा था जैसे साठ के दशक की किसी बी ग्रेड मर्डर मिस्ट्री के अंत में आपको मालूम चला हो  कि 'अरे! खून तो इस चम्पू ने किया है!!'
खैर, मैंने अर्ज़ किया "बेटा (गुस्ताख़ी माफ़ ) तुम्हारे पास तो तुम्हारा अलग कमरा है" | "ह्म्म्म !! है तो, लेकिन कहने भर को" उसने फ़रमाया | आजकल के ये बच्चे, कभी कभी बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि उनके अन्दर घुस कर कोई न्यूज़ चैनल का एंकर बात कर रहा है |

फिलहाल, उसी अदा में अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वो बोला "जब देखो तब मम्मी आ जाती हैं, बिना दरवाज़ा नौक किये...घड़ी घड़ी बोला जाता है कि चद्दर ठीक क्यों नहीं है, टेबल ऐसी क्यों हैं,कपडे वहां क्यों रखे है, टोइलेट में इतना टाईम क्यों लगता है..यहाँ तक की मेरी अलमारी भी रोज़ देखी जाती है"....."आप भी जब देखो तब खड़े हो जाते हैं और शुरू हो जाते हैं कि "किताबें बिखरी क्यों हैं..जूते बाहर क्यों नहीं रखे, हमारे टाईम में तो हम एक कमरे में कितने लोग सोते थे फिर भी अपना कमरा ऐसे रखते थे वैसे रखते थे वगैरह वगैरह, कमरा मेरा, पर मेरा कोई कंट्रोल ही नहीं उस पर...मुझे स्वायत्तता   चाहिए" .. धिशुं...धिशूं ...  धिशूं !!!!!!

यहाँ पर मुझे लगा कि उसने गब्बर को छोड़ कर, मुगले आज़म के सलीम का रूप धारण कर लिया है, जो अपने बाप से फरमा रहा है "मुझे अनारकली चाहिए"...( बिना जहाँपनाह जोड़े ) |
अब तक मैं भी अकबर की तरह हिलने लग गया था, मगर मेरे मूंह से बजाये "शेखू!! ये क्या बकवास है" निकलने के बजाय आदर्श पिता की सी मिमियाती आवाज़ में निकला "बेटा ऐसा थोड़े ही न सोचते हैं ... जो भी बोला जाता है तुम्हारे भले के लिए ही तो बोला जाता है"......धीरे धीरे, इस एक लाइन से शुरू हुए वाक्य ने, एक प्रवचन का सा रूप ले लिया ...फर्क ये था, कि सामने हाथ जोड़े कोई भक्त नहीं , मुंह फुलाए नौजवानी में कदम रखता हुआ बेटा बैठा था |
पता नहीं, ये मेरे दिमाग में घुसी हुई फिल्मों का असर था, बेटे का नया रूप था या कुछ और, कि मुझे लगा कि साक्षात् प्रभु शशि कपूर मेरे सामने खड़े हैं और पूछ रहे हैं...भाई तुम साइन करोगे या नहीं....."पापा आप स्वायत्तता दोगे या नहीं" |
ठीक उसी समय, मुझे यह लग गया कि यही वक्त है कि मुझे भी चोला बदल लेना चाहिए और मैं सीधा पिता से पी सी चि अर्थात पी सी चिदम्बरम बन गया | हिम्मत करके, गला साफ़ करते हुए मैंने फिर कहा "ठीक है इस विषय में कुछ ठोस कदम उठाये जायेंगे ,मैं मम्मी से बात करके उनकी राय जानता हूँ फिर सर्व सन्मती से फैसला लिया जाएगा" | अब बेटे की बारी थी "हूँ हूँ हूँ   " करने की |

खैर, ये मेरे आश्वासन का असर था...मेरे प्रवचन की बोरियत थी या फिर उसकी 'इनका तो अब कुछ नहीं हो सकता की निर्मल भावना', वो बहरहाल, वहां से सिर्फ "ओके" कहकर उठ लिया और मुझे 'कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे' सा चेहरा लिए पीछे छोड़ गया |

इस गुबार में, कहीं मुझे बहुत सी चीज़ें एक साथ महसूस होने लगी थी....पिता और पी सी चि की मजबूरी ... नयी पीढ़ी में कुलबुलाती प्राईवेसी की प्रबल भावना ...जेनेरेशन गैप...अपना भविष्य .... और कहीं, मेरे पेट से होती हुई दिमाग तक, टायलेट जाने की घनघोर इच्छा.....मेरा टायलेट...मेरा अपना टायलेट, यानी वो जगह...घर का वो इलाका... जहां सिर्फ मेरा राज था...सिर्फ मेरी स्वायत्तता थी |

- योगेश शर्मा