09 अप्रैल 2010

"पंथी"





धड़कने तक गूंजती हैं
खामोशियाँ छाई है कितनी
राह ढूंढे है अँधेरा
रात गहराई है इतनी

चांदनी में तर हवाएं
लोरिओं का राग दें
बिस्तरे में नर्म तकिये
बांहें फैला आवाज़ दें

पलकें हुयी जाती हैं बोझिल
जिस्म चाहे टूटता है,
हौसलों में मस्त ये मन
चलने को ही बस बोलता है

अभी मंजिलें पानी बहुत हैं
शिखर कितने जीतने हैं
नापना अम्बर है बाकी
ढेरों समंदर सोखने हैं

इक घड़ी को ही सही, पर
क्यों नींद में खोने की सोचूँ
ख्वाब कितने हैं अधूरे
क्यों भला सोने की सोचूँ

ख्वाब करने हैं जो पूरे
क्यों भला सोने की सोचूँ

- योगेश शर्मा