11 अप्रैल 2010

"टूटता सितारा"










देखा था बैठे बैठे,
एक टूटता सितारा,
कल रात छत पे, यूंही,
चाँद तकते, तकते,

दुआओं में फिर, अपनी,
मांग लिया था कुछ,
उस पल को, धीरे से,
पलकों में बंद करके,

छोटा सा इक ख्याल,
युहीं ज़ेहन में आया,
क्यों बुझ गया भला,
ये नूर जलते जलते?

तारों ने क्या इसे खुद,
है फ़लक से निकला,
या गिर पड़ा है थक के,
सदियों से चलते चलते |

- योगेश शर्मा