20 अप्रैल 2010

मेरे अपने - (पहला भाग)

कमाया है ये सालों में, यही   हासिल है बस मेरा,
ये मेरे दोस्त, मेरे हमदम मेरे साथी मेरे अपने,


लगी ठोकर हज़ारों बार, पर जब भी लडखडाया मैं,
कहीं से आ पहुँचते थे सहारे को मेरे अपने,


अहम में चूर कितनी बार, इन्हें कितना सताया था,
हंस कर माफ करते थे हर इक गलती मेरे अपने,


हजारों ग़म हो चाहे, मुझको  ना परवाह अब कोई,
कड़ी हर धूप में, बन जायेंगे साया मेरे अपने,



संभालूँगा मैं इनको, और  मुझे अब वो संभालेंगे,
ये ही दुनिया है बस मेरी, इक मैं और मेरे अपने |

- योगेश शर्मा