26 अप्रैल 2010

'फ़लक से वो फ़रिश्ता आज गिर गया'





कल  तक  जो  क़ायनात  की  रहबरी   में  था,
फ़लक  से   वो  फ़रिश्ता,  आज   गिर  गया,

मुझको नहीं  पता, आखिर हुआ ये  कैसे,  
मेरी  नज़र  से  मेरा,  हमराज़  गिर  गया,

पेशानी पे सजा जो चमकता था हरदम ,
उम्मीद  का  सुनहरी,  वो  ताज  गिर  गया

अश्कों से कल तलक हमेशा नम रहे थे ,
उन  कन्धों  से जाने मेरा  कब हाथ  गिर गया

हौले  से  दिल  के  हमने,  खींचें  थे  महज़  तार
क्यों  टूट कर  मोहब्बत  का,  साज़ गिर  गया

कितने ही ज़हर पीकर, जो कभी न लड़खड़ाया,  
बिन पिए जाने कैसे, कल रात  गिर गया

आइने तक से अब वो, नज़रे नहीं मिलाता
नज़रों से अपनी इतना, वो आज गिर गया

इतना है बदगुमाँ, कि चेहरा छुपाये बैठा,
शायद वो अपनेपन का नकाब गिर गया |


- योगेश शर्मा