27 अप्रैल 2010

'होता है तो होने दो'

हर रोज़ ये सुबह पूरब से,
पश्चिम को करवट लेती है,
अपना ही सूरज पूरब में,
जो ढलता है तो ढलने दो

सालों से मिट्टी की खुशबू,
बस यादों में ही बाकी है,
साँसों का दम धुएं में,
ग़र घुटता है तो घुटने दो

रंगों की इतनी बेहतर,
कहाँ रोज़ नुमाइश होती है,
आस्मां मे भरने को रंग,
घर जलता हैं तो जलने दो

सिखाएगा डसने का हुनर,
आखिर कुछ काम ही आयेगा,
आस्तीनों में,कोई सांप अगर,
जो पलता है, तो पलने दो |

- योगेश शर्मा