28 अप्रैल 2010

'इन्तेहा'





गया जो छोड़ के, तो बदनसीबी उसकी है
बहुत हैं राहों में पड़े, नज़र बिछाये हुए

उसे तो हमारी, बहुत जरूरत थी,
हम ही बिछड़ने की, हसरत थे छुपाये हुए,

साथ उसका छूटा, तो ज़ंग उतरने है लगा,
अरसा गुज़रा है ख़ुद को आज़माए हुए,

तुम एक रात के जागे हो यूं परेशां हो,
यहाँ इक उम्र बीती, हमें नींद आये हुए,

कहाँ दुनिया को है फुर्सत, हमे तंग करे,
ख़ुदी के मारे हैं हम, अपने ही सताए हुए,

गली के बच्चों की ही, कुछ शरारत होगी,
ज़माना गुज़रा, किसी को दरवाजा खटखटाए हुए,

चाहता हूँ, अब कोई और सज़ा दे मुझको,
थक चुका हूँ, ख़ुद को ख़ुदा बनाए हुए


- योगेश शर्मा