02 अप्रैल 2010

"जिंदा मुर्दे"


उसे यकीं है ये दुनिया है मुर्दों की
यहाँ सिर्फ मुर्दें ही सांस लेते हैं
पिघला के रूहें, बना के नश्तर  उनसे
जानें लेते हैं, लहू पीते हैं

इक ज़माने में वो भी था इंसान
जीने की हसरत में रोज़ मरता था
हुआ इंसानियत से भला क्या हासिल
ये तन्हाईयों में सोचा करता था  

जा मिला उस हुजूम में वो कब
नहीं पता बस खबर ही न लगी
इन्सां रहने में उम्र कितनी बीती थी 
मुर्दा बनने में इक घड़ी न लगी

अब नये रंग में मजे में है,
ख़ुशी के कहकहे लगाता है,
कोई इंसान होना चाहे फिर से
तो अपनी दास्ताँ सुनाता है

तारीफ करते न थके मुर्दा नगरी की
खामियां इंसानियत की गिनाता है
मरा तो जी उठा सदा के लिये
अब वो यूं ही जिये जाता है |





- योगेश शर्मा