12 अप्रैल 2010

'भूख'










भूख अपनी हो, या हो अपनों की,
तड़पाती है, तो इख्तेयार नहीं रहता,
छीन लेती है ऐसे, ये होश ओ हवास,
आदमी, फिर आदमी नहीं रहता,


जीती ज़मीन, जीते हैं समंदर कितने,
आदमी ,भूख से लड़कर बस नहीं जीता ,
इसकी मुट्ठी में कैद हो गया, वरना
आदमी कब का, खुदा बन गया होता



- योगेश शर्मा