09 मई 2010

मदर'स डे ...उर्फ़ नारी तेरी क्या औकात







क्यों ? चौंक गए ना यह शीर्षक पढ़ के!!!
हम मर्द बस यह शीर्षक पढ़ कर ही चौंक  सकते हैं वरना तो हमारा सारा जीवन ही नारियों को यह याद दिलाते रहने में ही बीत जाता है कि वो कितनी तुच्छ और निकृष्ट है |


मैं लेकिन यहाँ पर मध्य एशिआइ मुल्क, अरब मूल के मुल्कों या किसी और मुल्क की बात नहीं कर रहा, हिन्दुस्तान  के गावों कस्बो और छोटे शेहरो की बात नहीं कर रहा, नारियों पे हो रही बर्बरता और क्रूर हिंसा की बात नहीं कर रहा | मैं बात कर रहा हूँ...... अपने सो काल्ड अरबन समाज की और अपने  जैसे पढ़े लिखे पतियों की | अमेरिका और योरप जैसे विकसित कहे जाने वाले समाज की भी जहां  पति अब भी पत्नी  को अपने से कमतर समझते हैं |
मेरे जैसे ये पति प्रगतिवादी और आधुनिक पति हैं , ये पत्नियों पर हाथ नहीं उठाते ,ये पार्टियों में ,रिश्तेदारों में,दोस्तों में समानता की बात करते हैं| असलियत में लेकिन, इन्हें मन में बहुत गहरे तक यह विश्वास है कि ये वो देवदूत हैं जिन्हें ईश्वर ने नारियों के उत्थान के लिये चुना है | ये पति ख़ुद भी ये याद रखते हैं और अपनी पत्नियों को अक्सर ये याद दिलाते रहते हैं कि औरतों का क्या बुरा हाल है फलाने मुल्क में, फलाने प्रदेश में, फलाने घर में और देखो कम से कम हमारे घर में ऐसा कतई नहीं है |


ये बात हम उन को जाने अनजाने से, सीधे सीधे या बहाने से बता ही देते हैं के वो उस दुनिया से कितनी बेहतर हालात में हैं और कितनी सुखी हैं कि उन्हें इन जैसे पति मिले हैं | हमारा कितना बड़ा एहसान है उनपर कि हम उन्हें मारते पीटते नहीं, शारीरिक प्रताड़नाएँ नहीं देते, दहेज़ के लिये तंग नहीं करते, अपने माँ बाप, सगे सम्बन्धियों, दोस्तों से मिलने देते हैं ( ख़ुद भी अक्सर उन से हंस बोल कर मिल लेते हैं ) , मन मर्जी का खाने पीने पहनने देते हैं वगैरह वगैरह | पर जनाब हम करते क्या हैं, हम करते हैं साफ्ट बर्बरता, मानसिक दुर्व्यवहार, इमोशनल अत्याचार ... पूरे दिन, पूरी ज़िंदगी | कभी अनजाने में कभी जान बूझ कर, कभी गलती से, कभी सोच समझ कर, कभी आवेग में और कभी होशो हवास में |


अपनी पत्नियों से  उम्मीदें बड़ी बड़ी हैं हमारी | ये कुशल गृहणी हों, पाक कला से प्रेम कला में पारंगत हों,आदर्श माँ और पत्नी हों, ऐसी बहू हों जो सास ससुर को माँ बाप समझें | भले ही हम कभी अपने सास-ससुर को 'तुम्हारी माँ और तुम्हारे पिता' ही कहते मानते आयें |  
सुबह की चाय से रात का खाना हम जैसा मांगे और जहां जब चाहे मिले |फोन की घंटी से लेकर घर की घंटी तक का जवाब कोई दे तो यही दें क्योंकी हमको हिलना मना है | मतलब ये कि वो हर चीज़ में 'एडजस्टिंग' हों बस ...सीधी सीधी अंग्रेज़ी में |


हम यह भी चाहते हैं कि हमारी पत्नियां गुलाब सी खिली खिली दिखें , रसोई की गर्मी और घुटन के बाद भी फूलों सी मेहकें, चाहे हम ख़ुद मुंह में सिगरेट का भभका ,शरीर में पसीने की बू और गंदगी की महा मिसाल बने भी जब भी उन्हें गले लगायें, उनके मुंह से यही निकले ...वाह !! क्या जन्नत है |
भले ही हम, तोंद बढाए हुए अपने थुल थुल शरीर को दिन दूनी रात चोगुनी की मिसाल पर आगे ले जा रहे हों, पर दिली तमन्ना यही रहती है कि हमारी पत्नियों की काया कमसिन ही रहे नहीं तो हम दोस्तों रिश्तेदारों के सामने भी उनकी मट्टी पलीत करने से पीछे नहीं हटते हैं |


हम ये भी उम्मीद रखते हैं, कि वो हमें दुनिया का सबसे कुशल प्रेमी समझे ,दुनिया भर में हमारी खूबियों का गुण गान करे,हमारे सारे प्रेम किस्सों और  फैन्टेसीयों को वो ध्यान पूर्वक और वाह वाह करते हुए सुनें |यह और बात है कि गलती से अगर पत्नी ने ज्यादा नहीं सिर्फ यही बोल दिया कि 'कल रात मेरे सपने में जान अब्राहम आया था' तो हमें शायद ये लगेगा कि हाय! बस यह धरती फट जाए और हम उसमे समा जायें |


हम जो व्यवहार इनके साथ करते हैं उसका अगर एक प्रतिशत भी अगर ये पत्नियां हम से कर लें तो या तो हम उससे सम्बन्ध तोड़ लें,या उनका खून कर दें या फिर जनाब हम ख़ुद ही आत्महत्या न कर लें |
इनकी छोटी सी छोटी गलती, छोटी से छोटी बात वो भी जो हमें कहीं ज़रा सा अखरी हो हम ता-जिंदगी याद रखते हैं, मगर चाहते यह हैं कि हमारे बड़े से बड़े गुनाह भी वो यूं भूल जाएँ जैसे कुछ हुआ ही ना हो |


मुझे नहीं मालूम कि कब तक ये दौर चलेगा और कब ये सब बदलेगा | सोच बदल रही है ज़रूर नयी पीढ़ी में, लेकिन बहुत धीमी गति के साथ | इस सोच के साथ वो हमारा एहसान करने का सा संकीर्ण एहसास भी जाना चाहिए |
इन्हें सम्मान चाहिए लेकिन बिना एहसान | सम्मान एक बेटी का, सम्मान एक जीवन साथी का, सम्मान एक बहन का और सम्मान एक माँ का जो अपना जीवन देकर हमें जीवन देती है, जीना सिखाती है |


मगर ये सब मैं क्यों लिख रहा हूँ ....पाठकों में प्रशंसित होने को, अपनी पत्नी से सम्मान पाने को कि हाय मेरा पति कितना ऊंचा सोचता है, ख़ुद की नज़रों में महान बनने को या कुछ बोझ हल्का करने को |मुझे नहीं मालूम,पर शायद ये सही है कि हर पुरुष में कहीं न कहीं एक नारी होती है, ये शायद उसी नारी की आवाज़ है |


हम किसी एक दिन को मदर'स डे क्यों चुनते हैं हालांकी ये रोज़ होना चाहिए  है | कहीं पढ़ा था कि हमारे वेदों के अनुसार पति स्त्री का पहला पुत्र होता है क्यों की पत्नी माँ की तरह सारी उम्र उसकी हर छोटी बड़ी इच्छाओं का ख्याल रखती है |ये लेख मेरी माँ के लिये है, अपनी दूसरी माँ अर्थात अपनी पत्नी के लिये है, सब माओं और तमाम नारी जाति के लिये, जो किसी न किसे रूप में हमें हर पल पालती हैं ...उन सभी को मेरा शत शत नमन है ....हैप्पी मदर'स डे



- योगेश शर्मा