23 मई 2010

'तन्हाई के सहारे'

(पुनः संपादित )
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अपनी तन्हाई में पर्दों के ही सहारे हैं
देखते जिनको ये सारे दिन गुज़ारे हैं

हिलाएं इनको हवाओं के झोंके जब जब
ऐसा लगे घर में लोग सारे हैं

दीवार से घड़ियाँ उतार कर रख दीं
वक्त से रिश्ते रहे न अब हमारे हैं

प्यास थी बस हाथ ना बढ़ा पाए
यूं तो रहते यहीं दरिया किनारे हैं

पुराना चाँद वोही और सितारे मुट्ठी भर
अब यही रिश्तेदार सारे हैं |

- योगेश शर्मा