31 मई 2010

'ये कैसा इन्क़लाब'




है इन्क़लाब ,
ग़र लहू बहाने का ही नाम,
तो इन्क़लाब और अभी आयेगा,
ज़रा ठहरो तो,

खाद बारूद की है,
बोई हैं बंदूकें जहाँ,
खेत, लाशें ही उगाएगा,
ज़रा ठहरो तो,

नफरत के शोलों को
हवा देने वालों ,
घर तुम्हारा भी जल जायेगा,
ज़रा ठहरो तो,


इंसान की नस्ल को
बेहतर करते करते,
आदमी, जानवर बन जायेगा,
ज़रा ठहरो तो


रोज़ जो क़त्ल ख़ुदा,
कभी तेरा, कभी मेरा होगा,
शैतान ही मज़हब चलाएगा,
ज़रा ठहरो तो,


इन्क़लाब और अभी आयेगा
ज़रा ठहरो तो |

- योगेश शर्मा

4 टिप्‍पणियां:

  1. ज़रा ठहरो तो - एकदम समसामयिक और सटीक रचना योगेश भाई।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. adbhut...par yogesh ji mujhe poori ummeed hai jaldi hi inqlaab aayega...aisa ki har burayi ko jad se ukhaad dega...wo waqt ki jarurat ban chuka hai....bas aap aise hi jhakjhorte rahiye...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छा लिखा है मित्र !!! sundar और प्रेरक रचना ,,,,रत्तीभर भी कमी नहीं है ,,,रचना खुद अपनी तारीफ़ कर रही है !!!

    उत्तर देंहटाएं

Comments please