02 मई 2010

'ख़ुद से अजनबी '




 लगता कभी है जैसे,
  किसी और से सुने हैं,
  अक्सर ये लफ्ज़ मेरे,
  अपने से नहीं लगते, 
 तहरीर तो है मेरी,
  तजुरबे ख़ुद किये हैं,
  ख्याल क्यों न जाने,
  अपने से नहीं लगते,

बे-सबब बसर बस,
किये जा रहा हूँ ऐसे,
ज़िन्दगी किसी की,
जिये जा रहा हूँ जैसे,
ये अक्स तो मेरा है ,
दिखता जो आइने में,
अंदाज़ देखने के,
अपने से नहीं लगते,

रातों को कभी उठकर,
अपने को देखता हूँ,
हाथों से धीरे धीरे,
ख़ुद को टटोलता हूँ,
आँखे हैं ये मेरी,
नींदे भी तो मेरी हैं,
ये ख्वाब क्यों भला फिर,
अपने से नहीं लगते,

अक्सर ये लफ्ज़ मेरे,
अपने से नहीं लगते |


- योगेश शर्मा