03 मई 2010

"सपनों की दुनिया"



दूर पर ज़मीं जहाँ
आस्मां से मिलती है
जिस जगह खुशियाँ सभी
क्यारियों में खिलती है

कदम कदम पे इन्द्रधनुष
रौशनी लुटाते हैं
हर तरफ बस मुस्कुराते
चेहरे ही नज़र आते हैं

काश एक ही दिन को
मैं भी वहां जा पाता
उस रौशनी की बारिश में
मैं भी गर नहा पाता

जो अग़र ना जा पाता
हाथ ही बढ़ा सकता
खींच कर वहां से कुछ
रोटियां ही ला सकता

थोड़ी ख़ुद को दे देता
थोड़ी किसी अपने को
और पूरा कर लेता
एक वक्त के सपने को

खा के रोटियाँ फिर इक 
जाम पानी का पीता
आँखें अपनी बन्द कर के
गीत कोई गुनगुनाता

यूं ही गाते गाते बस
कुछ पलों में सो जाता
और उसी दुनिया के
सपनों में फ़िर खो जाता|


                                                    



    
  - योगेश शर्मा