13 जून 2010

'मेरी आवारगी'

(पुनः )
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कोई फितरत से आवारा,
कोई तबीयत से आवारा,
किसी को आवारगी का शौक,
मैं मजबूरी में आवारा,

थे वैसे रास्ते बहुत,
न समझा मैं किधर जाऊं,
था केवल मंजिलों का खौफ,
जहाँ जाऊं, जिधर जाऊं,
बचा जब कोइ न चारा,
तो घूमा बन के बंजारा,
किसी को आवारगी का शौक,
मैं, मजबूरी में आवारा,


मेरे भी नज़र के हैं नूर,
मेरा भी दर कहीं पर है,
बिछी पलकें हैं राहों में,
जहाँ पे, घर वहीँ पर है,
किसी का चाँद हूँ और हूँ,
किसी की आँख का तारा,
किसी को आवारगी का शौक,
मैं, मजबूरी में आवारा,


हालांकी हूँ मज़े में खूब
मगर ये लोग कहते हैं,
कभी तकदीर का मारा,
कभी बेचारा कहते हैं,
समझ का फेर है ये सब,
यही जंजाल है सारा,
किसी को आवारगी का शौक,
मैं, मजबूरी में आवारा,



ये आवारापन क्यों कहते हो 
बुरा इक रोग होता है?
रमाना मन बहुत पड़ता है,
बढ़ा एक जोग होता है,
बना हूँ जोगी राहों का,
इन्हीं के प्यार का मारा,
किसी को आवारगी का शौक,
मैं, मजबूरी में आवारा,




- योगेश शर्मा