06 जून 2010

'ये हौसले कभी कम न हों'



वक्त के चलने का सारा खेल है जब ज़िन्दगी ,
कैसे ये हो जाए कि फिर खुशियाँ हों पर गम न हों,

ज्यादा क्या मांगू मैं तुझसे, तूने ख़ुदा सब है दिया
इतना कर एहसान बस ये हौसले कभी कम न हों

उम्र साँसों की बड़े, ये कभी ख्वाहिश न की,
दर्द जितना चाहे दे दे,मुस्कुराहट कम न हों

आंसू तो मनमौजी ठहरें खुशियों में भी बहते हैं,
इतना कर, कि मुश्किलों में आँख मेरी नम न हो

जीत की खुशियाँ, मेरी तकदीर में हों या न हों ,
गलतियों का सोग न हो, हार का मातम न हो

ज्यादा क्या मांगू मैं तुझसे, तूने ख़ुदा सब है दिया
इतना कर एहसान बस ये हौसले कभी कम न हों,


- योगेश शर्मा

8 टिप्‍पणियां:

  1. सच ही है खुदा ने तो बहुत दिया है फिर भी मन तृप्त नहीं होता....अच्छी रचना

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  2. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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  3. एक सकारात्मक रचना...बहुत बढ़िया!

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  4. दर्द चाहे जितना दे दे, मुस्कुराहटें कभी कम न हों....
    ऐसा ही हो ...
    @
    जीत की खुशियाँ, मेरी तकदीर में अब ना भी हों ,
    गलतियों का सोग न हो, हार का मातम न हो

    ज्यादा क्या मांगू मैं तुझसे, तूने ख़ुदा सब है दिया
    इतना कर एहसान बस, ये हौसले कभी कम न हों,

    हौसले बने रहें तो हर मुश्किल आसान होती है ...!!

    इस सकारात्मक पोस्ट के लिए आभार ...!!

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  5. ये साँसे तोड़ती हैं दम, दुआ निकले यही लब से,
    जिस्म का मेरा , हर कतरा, मेरे कातिल के काम आये.
    बहुत खूब योगेश साहेब.

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