17 जून 2010

'आज भी जिंदा हूँ मैं'



ज़िंदगी  ने  लाख  चाहा
सूख जाए खून  मेरा
रूह आँखे मूँद सोये  
 और ज़मीर हो जाए बहरा

मुझको  भी  लगता  था  डर,
ये  कहीं  सच  हो  ना  जाए ,
चेहरे की मासूमियत
भीड़ में  ग़ुम  हो न  जाए

सोच  के  फिर, थोड़ा  मैंने
गौर  ख़ुद  पर कर लिया
बीते सालों  का हर लम्हा
 फिर से दोबारा जिया

और ये पाया मैं खुश हूँ
खुशियाँ  जहां की  देख  कर
आँख  हो जाती है नम सी 
कोई  आस  टूटी  देख कर

अब  भी उफ़नता  है लहू
जब  ज़िंदगी  छीने  कोई,
 लुटता है कहीं घर किसी का
जब अस्मतें  कुचले  कोई

मस्तियों में डूबता हूँ
बहारें जब जब भी छायें  
नाचता है मन खुशी से,
बरसें जब काली  घटायें 

                                      झूम के  लगता गले  हूँ
 कोई दोस्त  मिल जाए कहीं    
दिल मचल जाता है अब भी
देख कर चेहरे  हसीं

कांपते  हैं  हाथ, जब जब  
झूठ  मैं  हूँ  बोलता
याद करता हूँ ख़ुदा को
डर से जब मन डोलता

दिल से अभी इंसानियत  के
एहसास हैं उतरे नहीं
वक्त  की कैंची ने अब तक
सारे पर कुतरे नहीं

परवाज़ जिसकी है सलामत 
अब भी वो परिंदा हूँ मैं
जानकर अच्छा लगा, कि
आज भी जिंदा  हूँ  मैं
 
जानकर अच्छा लगा, कि
आज भी जिंदा हूँ मैं  |



- योगेश शर्मा

8 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sundar prastuti

    aaj bhi jinda hoon main

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

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  2. आशाओं से भरपूर एक सार्थक रचना योगेश भाई। कभी की लिखी ये पंक्तियाँ याद आयीं-

    जीने की ललक जबतक साँसों का सफर होता
    हर पल है आखिरी पल सोचो तो असर होता

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  3. परवाज़ जिसकी है सलामत
    ऐसा अभी परिंदा हूँ मैं
    जानकर अच्छा लगा कि
    आज भी जिंदा हूँ मैं
    waah bahut sundar...

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  4. जानकर अच्छा लगा कि
    आज भी जिंदा हूँ मैं
    एहसास के जिन्दा रहने तक तो जिन्दा है ही हम, विश्वास के जिन्दा रहने तक तो जिन्दा है ही हम,
    जी हाँ हम जिन्दा है

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  5. क्या सर.... कितना लाजवाब करेंगे? ग़ज़ब की और सुंदर अनुभूति....

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  6. दिल से अभी इंसानियत के
    एहसास हैं उतरे नहीं
    वक्त के कैंची ने अब तक
    सारे पर कुतरे नहीं...

    और ये देखकर अच्छा लगा की जिन्दा हूँ मैं ...अंतर्मन में इंसानियत जिन्दा रखने की जंग रहती है हमेशा ....!!

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  7. इस चेहरे की मासूमियत
    भीड़ में ग़ुम हो न जाए
    दिल से अभी इंसानियत के एहसास हैं उतरे नहीं वक्त की कैंची ने अब तक सारे पर कुतरे नहीं
    योगेश शर्मा जी आपको सलाम इतने अच्छे पगामात के लिए. इसे जारी रखें कभी तोह किसी का ज़मीर जागेगा?

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  8. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. मधुर भाव लिये भावुक करती रचना,,,,,,

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