27 जुलाई 2010

'बनकर ज़ुबां मेरी'



कल रात फिर मुझे वो मदहोश कर गया
बनकर  ज़ुबां  मेरी, मुझे खामोश कर गया

कोई याद, कोई हसरत, कोई  जुस्तजू  नहीं  
सारे जहां से ऐसे फ़रामोश  कर गया

अहले चमन में कब से खिज़ा के बसेरे थे
बन कर बहार मुझको, ग़ुलपोश  कर गया

आवारगी तो उसकी यूं भी  संभल ही जाती 
कमबख्त मुझको ख़ानाबदोश कर गया |


- योगेश शर्मा