18 सितंबर 2010

'वो जो टुकड़ा है बादल का'





मैंने बचपन से, यादों में संभाला है जिसे
बंद पलकों  में, खुली आँखों में पाला है जिसे
दूर अम्बर पे , घटाओं  में, बसर मेरा है
वो जो  टुकड़ा  है बादल  का, वो घर  मेरा है

स्याह रातों में, बर्फ जैसे चमकता है जो
ज़र्द पतझड़ में, बहारों सा महकता है जो  
हर  एक लम्हा,  हर शाम -ओ- सहर मेरा है
वो जो  टुकड़ा  है बादल  का, वो घर  मेरा है


हर नयी सुबह, सदा दे कर उठाता है मुझे  
थपकियाँ देके थकी रातों में सुलाता है मुझे 
है मेरी रूह और जाने  जिगर  मेरा है
वो जो  टुकड़ा  है बादल  का, वो घर  मेरा है


न मैं रहता हूँ वहां, और न गया हूँ कभी
पर मेरे  दोस्त, सभी अपने, बसते  हैं वहीं
नहीं मंजिल वो, बस इक  हमसफ़र मेरा है 
वो जो  टुकड़ा  है बादल का, वो घर  मेरा है
वो जो  टुकड़ा  है बादल  का, वो घर  मेरा है|


- योगेश शर्मा