27 अक्तूबर 2010

'ये आँखें ढूँढती हैं माँ'


ये आँखें ढूँढती हैं माँ, तुझे घर के कमरों में
आवाजें गूंजती है माँ, तेरी घर के कमरों में


आवाजें हैं बहुत सारी, जो रह रह के आती हैं
कभी कानों में धीरे एक लोरी गुनगुनाती है
कोई आहट हौले से बुलाती है मुझे "बेटा"
जाकर खोजता हूँ मैं , तुझे फिर घर के कमरों में


ये आँखें ढूँढती हैं माँ, तुझे घर के कमरों में


मैं ये जानता था माँ, कि तुमको दूर जाना है
जाकर उस जहां में फिर, तुम्हें वापस न आना है
न जाने क्यों यकीं मेरा , कहीं उम्मीद रखता है
कभी तो इक झलक मिल जाए, तेरी घर के कमरों में


ये आँखें ढूँढती हैं माँ, तुझे घर के कमरों में


बहुत सा प्यार मैंने, जाने तुझसे क्यों छुपाया था
बहुत सी बात कह दीं, पर बहुत कुछ कह न पाया था
जो बोलीं उन पे रोता हूँ, मगर जो कह नहीं पाया
वो बातें बोल लेता हूँ, ख़ुद ही से घर के कमरों में


ये आँखें ढूँढती हैं माँ, तुझे घर के कमरों में


कभी चुपके से कोनों में, मैं छुप के रो भी लेता हूँ
कोई दिख जाए जो आते, तो आँखें पोंछ लेता हूँ
तुम्हें फिर यादों में, तस्वीरों में ,सपनों में मिलता हूँ
और लग जाता हूँ, वो खुशियाँ सजाने घर के कमरों में


ये आँखें ढूँढती हैं माँ, तुझे घर के कमरों में


तुम्हें मुक्ति मिली, ये सोच कर खुश हो भी जाऊंगा
करूं इस दर्द का अब क्या, कि किसको माँ बुलाऊंगा
मेरे माथे को छूकर हाथ जो, आशीष देते थे
कहीं उनके निशां मिल जाएँ, मुझको घर के कमरों में


ये आँखें ढूँढती हैं माँ, तुझे घर के कमरों में
आवाजें गूंजती है माँ, तेरी घर के कमरों में


- योगेश शर्मा