10 फ़रवरी 2011

'वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया'


ख्वाब को आँखों में रोके रखना था
पोर में मोती पिरोये रखना था
टूट कर गालों पे जलने क्यों दिया
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

थक चुके उजालोँ से छिपते भागते
माँगा अंधेरों ने सुकूँ था रात से 
शब् भर चराग़ों  को जलने क्यों दिया  
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

लड़खड़ाती थी तो थी उम्मीद उनसे
न आजमाते तो बंधी थी आस उनसे 
इन हवाओं को संभलने क्यों दिया  
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

मुस्कराहट से कशिश कुछ बाकी रहती  
गुफ्तगू से तपिश  कुछ बाकी रहती   
बर्फ को रिश्तों पे पलने क्यों दिया 
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

उसे जब तलक खोने से कुछ डरते रहे
प्यार उससे कितना  हम करते रहे 
डर के तूफां को संभलने क्यों दिया
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

आईने में अक्स जब जब देखता हूँ
रोज़ चेहरा इक नया सा देखता हूँ 
ख़ुद को इतना भी बदलने क्यों दिया
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

प्यार था इतना, छिपाते क्यों रहे
ख़ुद को यूं पत्थर बनाते क्यों रहे
दिल को मुट्ठी में पिघलने क्यों दिया
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

इसकी तहरीरें समझ आयी हैं जबसे
लकीरें हाथ की चुभती हैं तबसे
आज को ये कल उगलने क्यों दिया
वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया

वक्त को लम्हे में ढलने क्यों दिया





- योगेश शर्मा