09 जून 2011

'क्या पढ़ते हो तुम'



अपनी आँखों में सवालात से गढ़ते हो तुम
मेरे चेहरे पे हर वक्त क्या पढ़ते हो तुम

मुझसे पूछो मैं खुद ही बता दूंगा तुमको
छुपा हूँ सबसे  मगर अपना पता दूंगा तुमको
वो भी कह दूंगा जो पूछते  डरते हो तुम
मेरे चेहरे पे हर वक्त क्या पढ़ते हो तुम

जाने क्यों लगता है तुम मुझको समझ पाओगे
जो न कह पाऊँगा तुम वो भी जान जाओगे
एक सुकूं मिलता है जब मेरी तरफ बढ़ते हो तुम
मेरे चेहरे पे हर वक्त क्या पढ़ते हो तुम

एक ज़रा डर है कि  मुझको समझने के बाद
मुझसे तुम शायद  कतराने न लग जाओ कहीं
मेरी हस्ती, मेरे ज़ेहन, मेरे माज़ी के वो सांप 
देख के मुझसे घबराने न लग जाओ कहीं  
दिल धड़कता है जब तह में उतरते हो तुम
मेरे चेहरे पे हर वक्त क्या पढ़ते हो तुम


अपनी आँखों में सवालात से गढ़ते हो तुम
मेरे चेहरे पे हर वक्त क्या पढ़ते हो तुम



- योगेश शर्मा