23 सितंबर 2011

'हम अगर दोस्त ही रहते'


 अपनी परवाज़ में 
रिश्तों की हदें क्यों बांधी 
मस्तियों में ही अगर उड़ते, तो अच्छा होता 
नए नामों से 
क्यों खुद को पुकारा हमने 
हम अगर दोस्त ही रहते, तो अच्छा होता 

झील के ठहरे हुए मंज़र में 
बस कहानी है 
और किनारों की 
खामोश निगहबानी है 
शोख दरिया सा ही बहते, तो अच्छा होता  

हम अगर दोस्त ही रहते, तो अच्छा होता 


न रंज कोई, न उम्मीद,
न होते अरमान
दिल के आले में रखने से
हुआ ये गुमान
सिर्फ आँखों में बसे रहते, तो अच्छा होता 

हम अगर दोस्त ही रहते, तो अच्छा होता
हम अगर दोस्त ही रहते, तो अच्छा होता...


- योगेश शर्मा