23 जनवरी 2012

'पसीना'






सजाई  है यूं  माथे  पर
चमक जैसे सितारों की
ये बूंदे साथ है मेरे
कमी फिर क्या बहारों की
छलकता जाए है तन से 
पसीना ये अनूठा है
है झरना हौसलों का इक
जो लावा बन के फूटा है  

कभी पेशानी से हो के
जो गालों पे टपकती है
हज़ारों घुंघरू बज उठे हों
बूंदे यूं छनकती है

मुझे मंजिल है दिखलाता
ये जो सूरज चमकता है
कभी ढलता नहीं हरदम    
इन आँखों में दमकता  है

है
चलने से कहाँ फुर्सत 
कहाँ है वक्त रोने का  
बदन का दर्द देता है
मुझे एहसास होने का |



- योगेश शर्मा