10 फ़रवरी 2012

'किसी काँधे पे सर रखूँ'



किसी काँधे पे सर रखूँ कि दिल की बात है बाकी, 
मगर अब न कोई अपना, न कोई साथ है बाकी


ज़माना और था, मदमस्त होकर भीगते थे हम,
न वो सावन, न वो झूले, न वो बरसात है बाकी


मनाना चाहूँ पर रूठे हुए साथी नहीं मिलते,
ये कोशिश क्यों न पहले की,ये अहसासात हैं बाकी


सफ़र लम्बा बहुत है और बड़ी शिद्दत की गर्मी है,
किसी आँचल के साए की बची बस बात है बाकी


लहू ये मेरे ज़ख्मों से ज़रा कुछ और बहने दो,
अभी तो सहना सीखा है, बहुत से घात हैं बाकी 


किसी काँधे पे सर रखूँ कि दिल की बात है बाकी




- योगेश शर्मा