14 फ़रवरी 2012

'सपने ही पाते हैं मंजिल'




सपने ही पाते हैं मंजिल
कदम तो चलते रहते हैं
सूरज तो चमके है हर पल   
दिन उगते ढलते रहते हैं


जीवन सूना दर्पण होता  
जो न होते स्वपन ये सारे
मन की कश्ती फिर भर जाए 
जाने कितने पार उतारे


कब ढलते हैं स्वप्न भला ये  
ढलते हैं बस  रात के साए 
जाता अंधियारा मुट्ठी में 
नन्हा उजियारा दे जाए


आशाओं की जगमग माला में  
रात तो एक  कड़ी है
गिरे अगर तो उठ सकते हो
ये समझाने ही जुड़ी है


पलकों के आले में ये 
अविरल जलते रहते हैं
सपने ही पाते हैं मंजिल
कदम तो चलते रहते हैं |





- योगेश शर्मा