27 जून 2012

'आसमां से एक तारा'




आसमां से एक सितारा मेरी छत प
ताकता रहता है मेरी ओर अक्सर

मुस्कुराए और शरारत से हंसे है यूं कभी
अपनी आँखों से ही जैसे बात कह दी हो सभी
मूंह चिढ़ाकर बादलों में फ़िर कभी छुप जाए वो
  छानी घटायें नज़रों से लेकिन नज़र न आये वो

 झाँक चुन्नट से वो जब बोले कि देखो आ गया
यूं लगे मुझको कि उस पल शै मैं सारी पा गया
ये मरासिम मुद्दतों से बीच अपने पल रहा
देख इसको चाँद कुछ कुछ बेवजह ही जल रहा
छूने को उस तारे मैंने हाथ तो अक्सर बढ़ाये
पर सितारे भी कभी क्या यूं किसी के हाथ आये
डर रहा हूँ साथ इक दिन ये कहीं न छूट जाए
ये सितारा ना कहीं ख्वाबों सा मेरे टूट जाए

थोड़ा डर और हसरतें पलकों में भर कर  
फिर पहुँच जाता हूँ मैं हर रोज़ छत पर 
आसमां से एक सितारा मेरी छत पर 
ताकता रहता है मेरी ओर अक्सर ।

 

- योगेश शर्मा