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01 मई 2026

'लहू है ये '



उसे किसी की फ़िक्र नहीं

कहीं पे उसका ज़िक्र नहीं

किसी ने उस को सुना नहीं

किसी नज़र ने पढ़ा नहीं

हदों में अपनी बंधा बंधा सा

रग़ों में ऐसे छुपा हुआ सा

जहां का है बस वहां नहीं

लहू है ये जो बहा नहीं


सिमट के रहता है जो बदन में

कैद बैठा है अंजुमन में

बहार आने की आस लेकर

चमन निखरने की प्यास लेकर

ग़ुलों से लेकिन जुड़ा नहीं

कभी खिज़ा से लड़ा नहीं

दर्द कोई सहा नहीं

लहू है ये जो बहा नहीं


पड़े हैं पलकों में बंद कितने

अनकहे से बयान बाकी

मंद साँसों में भरे हैं

थमे हुए तूफ़ान बाकी

हसरतों की नब्ज़ मद्धम

ख़ामोश है चाहतों की सरगम

गीत बाकी रहा नहीं है

लहू है ये जो बहा नहीं


दरिया उमर का उतर रहा है

और वक़्त भी पर क़तर रहा है

हक़ीक़त बदलना चाहे कैसे

ख्वाब कोई बुना नहीं

नज़र न राहों न मंज़िलों पर

धकेला जाता है हर सफ़र पर

कभी रास्ता ख़ुद चुना नहीं

लहू है ये जो बहा नहीं


नज़र में सूरज चमकने दो फिर

बदन को थोड़ा दहकने दो फिर

हौसले बे - लगाम कर के

जुबां को थोड़ा बहकने दो फिर

लाना उसे इंकलाब होगा

बहेगा तो ही सैलाब होगा

लहू है बस ग़र बहा नहीं

अभी लहू ये बहा नहीं


     लहू है ये जो बहा नहीं....


- योगेश शर्मा 

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