तमाम उम्र मुझसे
जो बा-वफ़ा रहा
जाने उसी से क्यों मैं
जो बा-वफ़ा रहा
जाने उसी से क्यों मैं
ख़फ़ा ख़फ़ा रहा
ऐसा हुआ है यूं ही
किसी एक बात पर
नाराज़ उससे अक्सर
लाखों दफ़ा रहा
वक़्त कितना खोया
लम्हे फ़ना किये
बैठा रहा अलग सा
अपनी अना* लिए
व्योपार में इस ज़िद के
हासिल न हुआ कुछ भी
ग़ुरूर फला फूला
बस इतना नफ़ा रहा
झूठे से फ़लसफ़े सब
खुद को सिखा दिए
आईने थे जितने
उसको दिखा दिए
और बाद तल्खियों के
समझाया खुद को ऐसे
कड़वी ज़ुबाँ हुयी थी
दिल तो सफ़ा रहा
तमाम उम्र मुझसे
जो बा-वफ़ा रहा
जाने उसी से क्यों मैं
ख़फ़ा ख़फ़ा रहा
*अना - स्वाभिमान
- योगेश शर्मा

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