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16 जून 2026

'ओ नारी'

हरदम हँसती ही रहती हो
ऐसा कैसे कर लेती हो

मिलते कांटे ही पग पग पे
प्यार लुटाती फिर भी जग पे
दर्द ये अपने और विष जग का
अपने भीतर भर लेती हो
ऐसा कैसे कर लेती हो

आंधी वर्षा धूप बवंडर
श्रम का क्रम चल रहा निरंतर
कभी रुकी भी ज़रा ठिठक कर
अगले पल फिर चल देती हो
ऐसा कैसे कर लेती हो

जिनकी लहरों से टकराकर
आशाओं की फूटे गागर
कठिनाई के वो महासागर
पल में पार उतर लेती हो
ऐसा कैसे कर लेती हो

स्वप्न किनारे करके अपने
पूरे करती सबके सपने
मुस्कानों को रखने जीवित 
रोज़ ज़रा सा मर लेती हो
ऐसा कैसे कर लेती हो

 रात कठिन या विकट सवेरे 
घाव भले हों कितने गहरे
एक हलके से स्पर्श से सारे
दर्द हृदय के हर लेती हो
ऐसा कैसे कर लेती हो

हरदम हँसती ही रहती हो
ऐसा कैसे कर लेती हो


- योगेश शर्मा  

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