गांव की नींदों में हरदम शहर के सपने रहे
शहर की आँखों में अब बस जागता एक गाँव है
दौड़ते जो थे वोही हर मोड़ पर रुकने लगे
हांफती सी हसरतें और थक चुके से पाँव हैं
चंद यादों से लिपटकर कल पता इतना चला
भर चुके ज़ख्मों में ज़िंदा आज भी कोई घाव है
हर मुसाफिर से वो बूढ़ा पेड़ कहता है रुको
फल भले मुझमे नहीं बाकी अभी भी छाँव है
ज़िंदगानी के जुए में ख़ुद को बहलाया यूँही
न चले तो मुकद्दर चल गया तो दांव है
तूफ़ान सुबहों में भरा हर रात में बहाव है
दरार सीने में लिए बह रही हर नाव है
- योगेश शर्मा

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