वो पहला ख़त मोहब्बत का मैंने खूब पाया था ,
महबूबा ने दुश्मन की किताबों में छुपाया था,
उमर भर हसरतें मंजिल की वैसे भी कभी ना की,
ये सदमें और हैं कि रास्तों पे प्यार आया था,
किसे अपना कहूं या रब, किसे अब समझूं बेगाना,
कहीं माझी ने पलटी नाव, कहीं दुश्मन ने बचाया था,
किसे अपना कहूं या रब, किसे अब समझूं बेगाना,
कहीं माझी ने पलटी नाव, कहीं दुश्मन ने बचाया था,
लगा ना डर मुझे मरने से यूं तो आज से पहले ,
ख़याल ऐ ख़ुदकुशी लेकिन कभी का छोड़ आया था,
दुआ थी मौत की माँगी मगर रूह कश्मकश में है ,
दुआ थी मौत की माँगी मगर रूह कश्मकश में है ,
कि मरते वक्त जीने पे वो दिल क्यों हार आया था |
- योगेश शर्मा
