देखा था बैठे बैठे
एक टूटता सितारा
कल रात छत पे यूंही
चाँद तकते तकते
दुआ में फिर अपनी
मांग लिया था कुछ
उस पल को भींच कर
पलकों में बंद करके
ख्याल छोटा सा इक
युहीं ज़ेहन में आया
क्यों बुझ गया भला ये
नूर जलते जलते
तारों ने क्या इसे खुद
है फ़लक से निकाला
या गिर पड़ा है थक के
सदियों से चलते चलते
देखा था बैठे बैठे
एक टूटता सितारा
कल रात छत पे यूंही
चाँद तकते तकते।
- योगेश शर्मा
