किसी ने उस को पड़ा नहीं है
किसी ने उस को सुना नहीं है
हदों में अपनी बंधा हुआ सा
रग़ों में जैसे छुपा हुआ सा
लहू है ये जो बहा नहीं है
घिसट रहा है बस बदन में
कैद बैठा है अंजुमन में
बहार आने की आस में ही
चमन निखरने की प्यास में ही
ग़ुलों से लेकिन जुड़ा नहीं है
कभी खिज़ा से लड़ा नहीं है
दर्द कोई सहा नहीं है
लहू है ये जो बहा नहीं है
पड़े हैं पलकों में बंद कितने
अनकहे से बयान बाकी
मंद साँसों में भरे हैं
थमे हुए कुछ तूफ़ान बाकी
हसरतों की है नब्ज़ मद्धम
है कबसे चुप चाहतों की सरगम
गीत बाकी रहा नहीं है
लहू है ये जो बहा नहीं है
दरिया उमर का उतर रहा है
और वक़्त भी पर क़तर रहा है
हक़ीक़त बदलना भी चाहे कैसे
ख्वाब कोई बुना नहीं है
नज़र न राहों न मंज़िलों पर
धकेला जाता है हर सफ़र पर
कभी रास्ता खुद चुना नहीं हैं
लहू है ये जो बहा नहीं है
नज़र में सूरज चमकने दो फिर
बदन को थोड़ा दहकने दो फिर
हौसले बे - लगाम कर के
जुबां को थोड़ा बहकने दो फिर
लाना इसे इंकलाब होगा
बहेगा तो ही सैलाब होगा
लहू है बस ग़र बहा नहीं है
अभी लहू ये बहा नहीं है
अभी लहू ये बहा नहीं है....
- योगेश शर्मा









