"बे - तकल्लुफ़"
""गलतियों की तल्खियां.... तल्खियों पे चुस्कियां""
09 मई 2026
'ख़ामोशियों की सरगम'
01 मई 2026
'लहू है ये '
किसी को उसकी फ़िक्र नहीं
कहीं पे उसका ज़िक्र नहीं
किसी ने उस को पड़ा नहीं
किसी ने उस को सुना नहीं
हदों में अपनी बंधा हुआ सा
रग़ों में जैसे छुपा हुआ सा
जहां भी है बस वहां नहीं
लहू है ये जो बहा नहीं है
घिसट रहा है बस बदन में
कैद बैठा है अंजुमन में
बहार आने की आस में ही
चमन निखरने की प्यास में ही
ग़ुलों से लेकिन जुड़ा नहीं है
कभी खिज़ा से लड़ा नहीं है
दर्द कोई सहा नहीं है
लहू है ये जो बहा नहीं है
पड़े हैं पलकों में बंद कितने
अनकहे से बयान बाकी
मंद साँसों में भरे हैं
थमे हुए कुछ तूफ़ान बाकी
हसरतों की है नब्ज़ मद्धम
हुयी है चुप चाहतों की सरगम
गीत बाकी रहा नहीं है
लहू है ये जो बहा नहीं है
दरिया उमर का उतर रहा है
और वक़्त भी पर क़तर रहा है
हक़ीक़त बदलना भी चाहे कैसे
ख्वाब कोई बुना नहीं है
नज़र न राहों न मंज़िलों पर
धकेला जाता है हर सफ़र पर
कभी रास्ता खुद चुना नहीं हैं
लहू है ये जो बहा नहीं है
नज़र में सूरज चमकने दो फिर
बदन को थोड़ा दहकने दो फिर
हौसले बे - लगाम कर के
जुबां को थोड़ा बहकने दो फिर
लाना इसे इंकलाब होगा
बहेगा तो ही सैलाब होगा
लहू है बस ग़र बहा नहीं है
अभी लहू ये बहा नहीं है
अभी लहू ये बहा नहीं है
लहू है ये जो बहा नहीं है....
- योगेश शर्मा
27 अगस्त 2025
" उसे खोजता था''
उसे खोजता था बड़ी मुद्दतों से
कहीं ढूंढता था उसे बस्तियों में
मंज़िलों पे रास्तों में
सेहरा समंदर वादियों में
कभी झलकता था वो नज़र में
मेरे ख़यालों की रहगुज़र में
अँधेरी रातों में नूर बन के
चमक दिखाता था सफर में
हर एक शै में था अक्स उसका
मगर मुझे वो नज़र न आया
थका निगाहों से ढूंढ कर जब
तो जाके दिल को ही आज़माया
मेरी मासूम इल्तिजा पर
दिल ज़रा सा मुस्कुराया
रागिनी धड़कन की छेड़ी
नाम हौले से गुनगुनाया
धुंध नज़रों की साफ़ करके
मुझको वो चेहरा दिखाया
मेरी तमन्नाओं की गली में
मेरी मुरादों के अंजुमन में
तलाश जिस फूल की मुझे थी
खिला हुआ था मेरे चमन में
मुझे बहुत था गुमान ख़ुद पर
कि सच झूठ सारे पहचानता हूँ
उस रोज़ जाके पता चला ये
ख़ुद को ही कितना कम जानता हूँ
जो मेरे इतने करीब सा था
पहचान उसको ही न पाया
नज़र में था तो दिखा नहीं क्यों
राज़ बस ये समझ न आया
- योगेश शर्मा
15 जून 2025
'सौ झूठ गढ़े'
'भीड़ में जीते रहे'
भीड़ में जीते रहे
और अकेले मर गए
न ग़लत थे न सही
बस सफर तय कर गए
ज़िन्दगी भी शोर-ओ-ग़ुल का
कैसा अजब बाज़ार है
हर कोई चिल्ला रहा
बस शोर का व्यापार है
मिलती ख़ामोशी है आख़िर
एक वही लेकर गए
न ग़लत थे न सही
बस सफर तय कर गए
25 मई 2025
"माफ़ कर दो"
11 दिसंबर 2023
'ज़िन्दगी हमेशा'
- योगेश शर्मा









