खड़ा हूँ इक बुलंदी पर, मगर ये दिल अकेला है
वहां कुछ दूर बस्ती में, लगा खुशियों का मेला है
कभी ये सोचता था बस, बड़ा हो जाऊं पल भर में
नदी ये जल्द जा पहुंचे , जवानी के समंदर में
न जाना इस जवां दरिया में, तूफानों का रेला है
खड़ा हूँ इक बुलंदी पर, मगर ये दिल अकेला है
फ़लक पर हों कदम तो, रोशनी नज़दीक आती है
झुलसता है मगर सब कुछ, ये आँखे चौंध जाती हैं
ज़मीं पे थे तो आसां था, यहाँ कितना झमेला है
खड़ा हूँ इक बुलंदी पर, मगर ये दिल अकेला है
जो पीछे छोड़ आया हूँ, वो फिर से आ ही जाता है
कभी सोचों में आके, एक बच्चा मुंह चिढाता है
बुलाता है वो घर आँगन, जहाँ बचपन में खेला है
बुलाता है वो घर आँगन, जहाँ बचपन में खेला है
खड़ा हूँ इक बुलंदी पर, मगर ये दिल अकेला है
