न मैंने देखा दानव ,
ना देखा मैंने ईश्वर,
इक नाम भय जगाये,
इक नाम से झुके सर
नहीं पता ये मुझको
दिखने में कौन कैसा,
है स्पर्श शांति का इक
दूजा सिहरन के जैसा
हैं दोनों अपने भीतर
अपना ही रूप हैं ये
कहीं मेघ काले गहरे
कहीं उजली धूप हैं ये
पिघले कमल के जैसे,
एक भोर की है लाली,
हर आस लील ले जो
एक, रात ऐसी काली
एक सिर्फ करता कब्ज़ा
हर आस, सांस पर
दूजा वो शक्ति देता
जैसे हों लग गए पर
अब है हमारे ऊपर ,
चाहे जगा लें जिसको,
उस जैसे ही बनेंगे ,
अपना बना लें जिसको |
