पूना के बम विस्फोट के बाद, हम सभी एक बार फिर हिल गए हैं | आखिर कब तक ये सिलसिला चलता रहेगा? समझ नहीं आता, कि भला ये किस मिट्टी के इन्सान हैं जो दहशत के ऐसा नंगा नाच करते हैं | क्या कोई नज़ारा ,कोई सन्देश,कोई आवाज़ या कोई भी चीज़ कभी उनके ज़मीर को झकझोरेगी | क्या कभी उन्हें एहसास होगा कि मज़हब, कौम और वतन के मायने कुछ दूसरें हैं और उनका ये रास्ता कितना गलत है?|
खैर, मेरी उम्मीद अभी भी कायम है, कि वो दिन ज़रूर आयेगा | अपनी दो कविताओं के ज़रिये मेरी ये कोशिश है कुछ सवाल उन तक पहुंचाने की जो यह दहशत फैला रहे हैं | कुछ पैगाम उनके नाम भी हैं जो इस खून - खराबे के कारोबार को इन्कलाब का नाम देते हैं |
१. ओ दहशतगर्द
किन इशारों पे नाचते हो, दिन रात,
गीत नफरत के गाये जाते हो,
न पता नाम, न पहचान शक्लों की,
फिर भी, दुश्मनी निभाए जाते हो,
मेले, लाशों के लगाये जाते हो,
ये प्यास क्या, जो मांगे खून, हर पल,
ये कैसी भूख, कि इंसान खाए जाते हो,
जानें लेकर जो और ज्यादा बढ़ती है,
इतनी नफरत किधर से लाते हो,
अपने बच्चों को, बजाये सपनों के,
सिर्फ बंदूके थमाए जाते हो |
२. ये कैसा इन्किलाब
है इन्किलाब, जो लहू बहाने का ही नाम,
तो इन्किलाब और अभी आयेगा, ज़रा ठहरो तो,
खाद बारूद की है, बोई हैं बंदूकें जहाँ,
खेत, लाशें ही उगाएगा, ज़रा ठहरो तो,
नफरत के शोलों को हवा देने वालों ,
घर तुम्हारा भी जल जायेगा, ज़रा ठहरो तो,
रोज़ जो क़त्ल ख़ुदा, कभी तेरा, कभी मेरा होगा,
शैतान ही मज़हब चलाएगा, ज़रा ठहरो तो,
इंसान की नस्ल को बेहतर करते करते,
आदमी, जानवर बन जायेगा, ज़रा ठहरो तो |
- योगेश शर्मा
