मैं तुमसे मुत्तासिर सही, पर इतना भी नहीं
कि अक्स बन तुम्हारा, वजूद खो दूं कहीं
ऊंचाई यूं तुम्हारी, लुभाती मुझे बहुत है
लेकिन ज़मीन अपनी प्यारी मुझे बहुत है
तुम्हारे कद को छूने, उछाल भरते भरते
ऊंचाइयों से अपनी, गिर जाऊं ना कहीं
मैं तुमसे मुत्तासिर सही, पर इतना भी नहीं
कि अक्स बन तुम्हारा, वजूद खो दूं कहीं
रिश्ता जिस्म से न मुझको तोड़ना है
इस कदर न तुमसे ख़ुद को जोड़ना है
कि साए में तुम्हारे, परवान चढ़ते चढ़ते
मेरे ही साए मुझसे खो जाएँ ना कहीं
मैं तुमसे मुत्तासिर सही, पर इतना भी नहीं
कि अक्स बन तुम्हारा, वजूद खो दूं कहीं
ये जानता हूँ मैं, तुम हल निकाल लोगे
कितनी भी करूं कोशिश, तुम मुझको ढाल लोगे
उस सांचे में मेरा दिल, होगा मगर नहीं
बुत बन के बस तुम्हारा, रह जाऊं न कहीं
मैं तुमसे मुत्तासिर सही, पर इतना भी नहीं
कि अक्स बन तुम्हारा, वजूद खो दूं कहीं
