दर्द ज़माने को दिखने में
कितने माहिर होते हैं
कभी होंठों से झर जाते हैं
कभी आँख से ज़ाहिर होते हैं
चेहरे पर झूठी मुस्कानों की
परतों से झांकते रहते हैं
कभी माथे की शिकनों से ये
बाहर को ताकते रहते हैं
हम एक भुलावे में रहते हैं
दर्द ये दिल में कैद पड़े
और हैं अपने राज़ सभी
अपने अन्दर महफूज़ बड़े
होंठो को हाथों से ढकते हैं
पलकों को कस कर मींचते हैं
अश्कों को कर के ज़ब्त ,अपने
ग़म को और भी सींचते हैं
इस फ़सल- ऐ- ग़म में हमदम
बस दर्द के फल ही आते हैं
जाने अनजाने में, हमसे
अपनों में बंट ही जाते हैं
अन्दर की खामोशी को
चीख के सब कह जाने दें
कभी ये अच्छा होता है
हम अश्कों को बह जाने दें |
- योगेश शर्मा
