भूख अपनी हो, या हो अपनों की, तड़पाती है, तो इख्तेयार नहीं रहता, छीन लेती है ऐसे, ये होश ओ हवास, आदमी, फिर आदमी नहीं रहता, जीती ज़मीन, जीते हैं समंदर कितने, आदमी ,भूख से लड़कर बस नहीं जीता , इसकी मुट्ठी में कैद हो गया, वरना आदमी कब का, खुदा बन गया होता