अक्सर, मन में मेरे यह विचार आये ,
कि, मनुष्य कहाँ से आये और किधर को जाए ?
जीव जीवन से पहले और मृत्यु के बाद क्या है ?
क्या आत्मा वोही पुरानी, चोला ही बस नया है ?
ईश्वर भला है कौन ,है कहाँ पर ,है कैसा ?
रौशनी है, कि छाया है, या फिर इंसानों जैसा ?
बुजुर्गों से सुना है, किताबों में पढ़ा है,
वो समय से पुराना और दूरियों से बड़ा है,
धरती जीव अम्बर उसने जो है बनाया ,
पर ख़ुद बना है जिससे, वो स्रोत कहाँ से आया?
पहले पल से पहले, जब वो ही हुआ था करता ,
हर तरफ कुछ न था तो, अकेला क्या था करता ?
इस तर्क वितर्क के जंगल में, यूँ ही भटके जाऊं ,
न तथ्य कुछ मिलें,न उसे मिथ्या ही मान पाऊं ,
ख़ुद ही से प्रश्न करता ,उत्तर स्वयं ही गढ़ता ,
प्रमाण ढूंढ़ने को जाने हूँ क्या क्या पढ़ता ,
ये उत्तर कहाँ से पाऊँ, कैसे ये रहस्य जानूं ?
प्रमाण से परखूँ इश्वर या श्रद्धा को ईश्वर मानूं ???
- योगेश शर्मा
