ऐसे मौसम थे कभी
दिन पलों में गुज़र जाते थे
चाँद टहलता था छत पे अक्सर
सितारे ज़मीं पे बिखर जाते थे
चलते चलते पांव ख़ुद से
खिंच जाते तेरे घर की तरफ
फिर चुप चाप गली से तेरी
बगैर आहट गुज़र जाते थे
रोज़ नुक्कड़ पर पर भरी धूप
उम्मीद करती थी इंतज़ार
देख कर चेहरा वो मिलती ठंडक
तपते मौसम भी निखर जाते थे
हाथ में लेके हाथों को बस
बैठे रहते थे खामोश यूँही
धडकनें ही बोलती थीं कुछ
और हम, सब समझ जाते थे
ऐसे भी मौसम थे कभी
दिन पलों में गुज़र जाते थे |
- योगेश शर्मा
