02 फ़रवरी 2010

"देश..प्रदेश...आम इंसान"

पिछले काफी महीनों से, और खास तौर से पिछले कुछ हफ़्तों से, देश में एक नया बवंडर उठ  रहा है ....प्रदेश वाद का और  भाषा विवाद  का | भाषा विवाद पर यूँ तो बहुत कुछ लिखने कहने को है पर फिलहाल अभी उसे किसी और समय के लिए रख छोड़ता हूँ |


आज एक तरफ  कहीं महाराष्ट्र ,मुंबई का मुद्दा कहीं तेलंगाना राज्य के लिए राजनैतिक  बहस  या  राजनीतिक दलों  की बयान  बाज़ी चल रही है और कहीं दूसरी तरफ कुछ मामूली ,गैर मामूलीं लोगों के मत और अभिव्यक्तियाँ दौड़ रहीं हैं | फिर इसके बाद इन सभी की क्रियाओं  प्रतिक्रियाओं की सर फुटौवल चालू है | साथ ही साथ हो रहे हैं  धरने प्रदर्शन ,तोड़ फोड़ और सब के बीच कहीं फंसा हुआ है इन सबसे   पीड़ित  एक आम इंसान |



ये सभी कुछ , बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है |
पहला ये , की कोई भी राज्य  देश का हिस्सा तो रहेगा ही, चाहे उसके  २०० किलोमीटर  वर्ग के ३ हिस्से कर दो   या 6०० किलोमीटर का एक रहने दो | बिना कुशल प्रबंधन और प्रभावी शासन तंत्र के ये समस्या ज्यों की त्यों रहेगी ,चाहे, हम प्रदेश के कितने ही टुकड़े क्यों न कर दें | 
दूसरी बात ये है की प्रवसन या माईग्रेशन का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी की मानव सभ्यता |  हमारे दादा परदादा भी कभी, उस प्रदेश में आये होंगे, जहाँ के हम आज निवासी हैं|
जैसे कहने को, मैं एक पंजाबी हूँ जिसके दादा 65 साल पहले लखनऊ आये थे और इस तरह मैं काफी हद तक लखनवी भी हूँ | पदाई के बाद रोज़गार के लिए पहले 16 सालों से असाम से गुजरात ,मुंबई  और पिछले चार सालों से दक्षिण भारत में हूँ | इस  विवाद के सन्दर्भ में  अगर राष्ट्रीयता निकाल दी जाए तो  फिर मैं   तो किसी प्रदेश का  भी नहीं  रहा ...अर्थात कहीं का नहीं रहा  |


देश के किसी भी हिस्से के विकास में हमेशा ,दूसरे  प्रदेश के लोगों का बहुत बड़ा योगदान  रहा है | चाहे वो सड़के ,पुल , बाँध हो या फिर टेलिकॉम, कंप्यूटर , बैंक या कोई भी टेक्नोलोजी इत्यादि हो | यदि ऐसा न होता तो आज हमारा देश न ही इतना विकसित  हो पाता और न मैं  या मेरे जैसे लोग देश के दूसरे   हिस्सों में  काम कर पाते और  लोकतंत्र तथा भारतीयता का सुखद अनुभव कर पाते .



 आज जो लड़ाई राज्य के लिए है , वो ज़रूर ही  कल शहरों और फिर गलियों तक पहुँच जायेगी ...आज जो झगड़ा   महाराष्ट्रियन और गैर-महाराष्ट्रियन के बारे में है वो शायद कल मुंबईकर और गैर मुंबईकर (भले ही वोह महाराष्ट्रियन क्यों न हो) के बीच शुरू हो जाए ...और  धीरे धीरे .हो सकता है की कल एक पूना में रहने वाला   मुंबई में भी काम  न कर पाए  और फिर  बोरीवली में रहने वाले व्यक्ति को वरली में  रोज़गार न मिले.......और फिर नौबत ये आये कि किसी गली नंबर  सात के रहने  वाले लोग गली नंबर  ८ में भी न घूम   पायें |



एक तरफ ये समस्या अभाव की  है.....वो चाहे सिस्टम की  हो ,पैसे की  हो ,आधारिक संरचना (इन्फ्रास्त्रुक्चेर  )की  हो या फिर रोज़गार की हो | झगड़ा  इस बात का   नहीं के यूपी बिहार के मजदूर या टैक्सी वाले कहीं भी सो जाते हैं या कहीं भी नहाते, धोते ,गन्दगी करते है| समस्या ये है की इन सभी ज़रूरतों  को पूरा करने वाले सिस्टम का अभाव है क्योंकि यह परेशानी  एक महाराष्ट्रियन टैक्सी वाले  या मजदूर के लिए भी  उतनी ही बड़ी है....रहने के मकानों , शौचालयों , स्कूलों,अस्पतालों  का अभाव उनके लिए भी उतना ही है | भिखारी वर्ग जो मुंबई की एक बहुत बड़ी समस्या है ,वे  पूरे प्रदेश से देश से वहां पहुंचे हुए हैं | क्योंकि, गरीबी तो सबकी साझा है ....और इस पर किसी भी एक धर्म , भाषा ,जाति का ठप्पा नहीं है |



दूसरी तरफ ये समस्या हमारी  मानसिकता की भी है |जब तक, कोई भी परेशानी संयम से या प्रेम से सामने रखी जाती है ,तब तक उस पर फूंटी आँख तक नहीं फेरी जाती | परन्तु ,जैसे ही उसे अनशन, हड़ताल ,प्रदर्शन तोड़ फोड़ का जामा पहना दिया जाता है तो हर एक चीज़ हरकत में आ जाती है और यहाँ तक की हम भी टीवी चैनल बदल बदल कर उसे देखने लगते हैं| ये चाहे कोई राजनीतिक समस्या हो,खेलों और खिलाडियों की समस्या हो, मानवीय अधिकारों की बात हो संसाधनों या फिर मजदूरों की समस्या हो |  ये हल्ला गुल्ला होने के बाद फिर हम सभी यही कहते हैं ये बातें भला मैत्री पूर्ण वातावरण में परस्पर बातचीत से आराम से क्यों नहीं होती हैं ?



ये मानसिकता पुरे विश्व की  है और परन्तु हमारा   देश  इससे कुछ ज्यादा ही प्रभावित है | कुछ लोग इस बात का  फायदा  उठाते हैं और प्रतिक्रियाएं और लोकप्रियेता पाने के लिए इसका भरपूर इस्तेमाल करते हैं | हम ,एक आम आदमीं इससे वशीभूत होकर न सिर्फ अपनी प्रतिक्रिया देता है बल्कि पहले तो  अपना खूब इस्तेमाल  होने देता है और फिर बाद उस नुक्सान की लगातार भरपाई भी करता है |



जो बात, हमारे  जैसे आम सोचने वाले आम आदमी के दिमाग में हलचल मचा सकती है वो इन राजनीतिक दिग्गजों को कचोटती क्यों नहीं है |ये कैसी राजनीति है जो  रोज़गार ,गरीबी, आतंकवाद, गुंडागर्दी, बलात्कार, की लड़ाई के बजाये प्रदेशों के बटवारे  ,धर्म और भाषा  के मुद्दों पर कोहराम मचा रही हैं |
अपने राजनैतिक भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए जो मुद्दे सारी राजनैतिक पार्टिया उठा रही हैं वो बहुत जल्द भस्मासुर  दानव की तरह उन्हें भी ले डूबेंगी ये बात उन्हें समझ में आ जानी चाहिए |



ये समस्याएँ  किसी भी राज्य और किसी भी जाति की हैं | आम आदमी हर कोई है....... एक ठेला खींचने वाला, एक सरकारी गैर सरकारी कर्मचारी,  दूकान वाला,  बैंक मेनेजर, विद्यार्थी,एक कंप्यूटर इंजिनियर कोई भी |
एक आम आदमी को चाहिए की  अपने आपको दूसरों को सौंपने , भेड़ बकरी की तरह हांके जाने , हाथ में पत्थर  उठा कर और हाथों में मशाल  लेकर अपनी ही चीज़ों का नुक्सान करने के बजाये ये समझे कि  वो  एक इन्सान है जिसे बुनियादी चीज़ों की समझ है | वो सोच सकता है,   इन लोगों से जवाब मांग सकता है, और अपने कुछ फैसले खुद ले सकता है | वो साधारण फैसले जिनके  बेहद असाधारण नतीजे निकल सकते हैं |


इस तरह हम ज़रूर पायेंगे कि हमारा  इस्तेमाल हमारी मर्जी के बगैर हो ही नहीं हो सकता है |धीरे धीरे   समस्या निर्वारण  की प्रक्रिया में हम भी शामिल हो सकेंगे  और  जो ताकत कुछ लोगों के हाथ में हमने खुद दी है वो  एक बार फिर हमारे हाथों में होगी

इसी  तरह ,हम सभी न केवल  शिवाजी महाराज के सपने "महाराष्ट्र"  अर्थात  "एक महान  राष्ट्र" का सही मतलब समझ पाएंगे  बल्कि  उसे साकार करने में  भी एक मत , एक जुट हो जायेंगे  |

 - योगेश शर्मा