20 मार्च 2011

'उजाले की नींव'




दिखें मंजिलें नहीं, स्याह रास्ते हैं बस
खेत आहों के हैं, फसलें ग़म की हैं बस
 
इमारतें हर तरफ, घुप  अँधेरे  की हैं
 रोशनी को तलाश, इक सवेरे की है
 
उसके इंतज़ार में, कितना  बैठेंगे अब
ओढ़ी बेहोशी से, थक के जागेंगे कब
 
यूं  ही पलकों को मींचे, जो कुछ और बैठे
  देख पाएं जो उजाले,  वो नज़रें न खो दें
 
  रूह तो फुंक रही, ज़रा राख ही संभालें
चिंगारी सी बची है, शोला उसे बना लें
 
अपनी ही रौशनी को, अब दबाना नहीं है
अपने इन्सां को खुद से, छुपाना नहीं है

हों परेशान क्यों, ग़र जहां सो रहा है
अपने मन को जगा लें, जो आसमां सो रहा है

जिस तरह एक जागा, वैसे जागेंगे सब 
 नींव रखें अपने हाथों, एक उजाले की अब 

नींव रखें अपने हाथों, एक उजाले की अब | 

 - योगेश शर्मा