12 जून 2010

'हिन्दोस्तानी होने के फ़ायदे'

एक हिन्दोस्तानी होने के कितने सारे फ़ायदे  हैं, इन पर हमने शायद कभी गौर नहीं किया है | एक विशुद्ध हिन्दोस्तानी होने के नाते मेरा यह फ़र्ज़ बनता हे कि मैं न सिर्फ इनपर गौर करूं बल्कि आप दोस्तों को भी जबरन गौर करवाऊं |

तो साहेबान, सोचिये कि अगर हम हिन्दोस्तान में न होकर, कहीं और पैदा हुए होते तो यह जीवन कितना नीरस होता | यह बात वो लोग तो और भी ज़्यादा समझेंगे जो या तो अब विदेश में रहते हैं या रह कर वापस आये हैं | उस पल की कल्पना करते ही, जब विदेश जैसा ही माहौल हमारे देश में होगा, जिस्म में मोबाइल फोन के वाइब्रेशन सी  कंपकपी सी छूटने लगती है |

मसलन, अगर आपको यह मालूम चले, कि कल से आप सड़क पर अपनी मर्जी से थूक नहीं सकते, उस पर सरे आम कूड़ा नहीं फ़ेंक सकते क्योंकी आप फलां फलां मुल्क में हैं, तो क्या आपको ऐसा नहीं लगेगा, कि जैसे किसी ने आपके खाने में से सारा नमक ही सोख लिया हो | आपकी जलेबी से सारी चाशनी चूस ली गयी हो...जैसे आपकी नागरिकता ही आपसे छीन ली गयी हो |

पान खाने के बाद अगर हम फर्श और दीवारों पर अपनी कला के नमूने नहीं छोड़ सकेंगे तो फिर क्या ख़ाक बचेगा इस ज़िन्दगी में | ज़रा सोचिये, अगर हमें कहीं जाने के लिए सड़क की सिर्फ एक ही दिशा का इस्तमाल करना पड़े और हर लाल बत्ती पर रुकना पड़े तो क्या हम कोइ भी काम टाइम पर कर पाएंगे| फुटपाथ का इस्तेमाल अगर सिर्फ चलने के लिये हो, तो कितनी उजाड़ लगेगी वो जगह | अम़ा हुज़ूर लानत भेजिए उस फूटपाथ पर जहाँ फल सब्जी से लेकर मछली मुर्गा ,साइकल पुर्जे से लेकर , कुरते, साड़ी, पतलून, चाकू, पेचकस,जूते सीडी डीवीडी आदि न मिलते हों | इसी लिये ही तो हमारे फूटपाथ कहलाते हैं 'मीना बाज़ार' | 

अगर हमें मल मूत्र विसर्जित  करते हुए, इच्छानुसार धूप, खिली हुयी चांदनी, ताज़ी हवा या गाड़ियों के धुएं का सेवन, धूम्रपान अथवा ट्रैफिक या सड़क पे चल रहे लोगों के दर्शन करने से रोका जाएगा तो क्या हमारा शारीरिक और मानसिक विकास हो पायेगा??

इन कमबख्त विदेशियों को यह कौन समझाए, कि इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में जहां वर्जिश के लिये कतई समय नहीं है, वहां पर दीवार फांदने, रेलवे क्रासिंग पर जाली के नीचे से निकलने, प्लेटफार्म को कूद कर पार करने से ना सिर्फ व्यायायाम होता है, बल्कि समय भी बचता है| ये समय हम, सहूलियत और श्रधानुसार  ख़ुद को, परिवार को, प्रेमी/ प्रेमिकाओं, अड़ोस पड़ोस, दोस्तों और कभी कभी अपने काम को भी दे सकते हैं |
 
कैसे होते हैं वो देश, जहाँ सडकों पर बारातों की रौनक नहीं होती ? जहां सामाजिक तथा राजनैतिक जुलूसों की वजह से जगह जगह ट्रैफिक जाम नहीं होता? जहां पर नेताओं के भव्य कट आउट और सुन्दर मूर्तियाँ शहर की शोभा नहीं बढाती | मानव, पशु सभी एक समान का नारा लगाती हुयी, मंद मंद मुस्कान लिए जुगाली करती हुई गाय, भैंसे, बकरियां क्या किसी और देश की सड़क पर बैठी मिलेंगी?? नहीं हुजूर, बिलकुल नहीं !!


ऐसे देश में, मेरी या फिर मेरे जैसे पतियों की मर्दानगी का भी कोई भविष्य नहीं है | एक हिन्दोस्तानी पति परमेश्वर होने के नाते जो थोड़ा बहत रौब मैं अपनी पत्नी पर झाड़ पाता हूँ , उसका तो डब्बा ही गोल हो जाएगा | बिस्तर पर ही सुबह की चाय से लेकर, टीवी के सामने रात के खाने तक का सौभाग्य क्या, बचा रहेगा मेरे नसीब में?  अपने जूठे बर्तन उठाने की वो खुशी जो मैं हर रोज़ अपनी पत्नी को देता हूँ, क्या फिर दे पाऊँगा? मेरी ही तरह वो सारे मर्द जो यथा रुची और यथा शक्ती अपने पत्नी-बच्चों को डांटने,फटकारने और पीटने का सुख उठाते हैं, उनका तो भविष्य अंधकारमय हो जाएगा |


मुझे नहीं लगता, कि फिर इसके बाद भारतीय नारी के त्याग और महानता के बारे में ज़्यादा कुछ लिखने और कहने को बचा रह जाएगा | शायद फिर किसी भारतीय नारी को यह मौका नहीं मिलेगा कि वोह रोज़ सुबह से रात तक एक पैर पे खटने, पति के थप्पड़ खाए हुए चहरे को लाली पाऊडर और हंसी से छुपा के लोगों से मिलने और फिर रात के एक ही सीन में, पति के पैर दबाने से लेकर प्रेम की देवी का रोल करने की बात भी दिमाग में लाये| फिर हमें शायद इतिहास पढ़ कर ही संतोष करना पड़े  कि कभी नारियां ऐसी आल राऊंडर भी हुआ करती थीं |यहाँ तक की नारी सेवा, नारी मुक्ति संस्थाओं में भी ताला लग जाएगा |

ज़रा सोचिये कि  देश की दीवारें कितनी वीरान लगेंगी, जब  वहां न  'रिश्ते ही रिश्ते' से लेकर 'मर्द निराश न हों' जैसे मनोबल बढ़ाने वाले इश्तेहार होँगे न ही 'हर घर में आटा होगा हर पैर में बाटा होगा' जैसे चुनावी वादे, न ही कोई राजनैतिक पोस्टर | न ही 'यहाँ पेशाब करना मना है' जैसे  कानून व्यवस्था का संतुलन बनाए रखने में मदद करने वाले और  ना ही सामजिक उत्थान हेतु 'घर बैठे ग्रजुएट बनें' से लेकर डाक्टरी, इंजीनिअरिंग, और अन्य ट्यूशनों की जानकारी  देने  वाले  सन्देश  होँगे|  पता नहीं फिर उस देश के बच्चों का बुद्धि और शिक्षा विकास कैसे होगा??

 तो जनाबे आली , हम इस परम्परा को किसी कीमत पर लुटने नहीं देंगे,किसी को भी इसके गौरव से खिलवाड़ नहीं करने देंगे और किसी को अपनी आज़ादी छीनने नहीं देंगे | हम इस देश को बदलने की बात तो दूर, किसी और देश में पैदा होने की बात तक नहीं सोचेंगे | इसका सीधा मतलब होगा, हमारा विनाश, हमारी हज़ारों साल पुरानी परम्परा का नाश |

 मुझे मालूम है कि बहुत सी देशी - विदेशी संस्थाएं , कुछ नेता, कई लेखक,दार्शनिक तथा कवि, ढेर सारे टीवी चैनल और सामाजिक कार्यकर्ता छाप लोग हमारा दिमाग खराब करने में लगे हैं | इन सबका, सिर्फ एक ही उद्देश्य है हमारा, ख़ास तौर से हिन्दोस्तानी मर्दों के जीने का हक़ छीनना , और हम ये कतई होने नहीं देंगे ...किसी, किसी...किसी कीमत पर नहीं |