01 सितंबर 2010

'अपने अपने हिस्से का ग़म'



अपने अपने दुखड़ों की 
है पोटली सबके दामन में
अपने अपने हिस्से का ग़म
यहाँ हर किसी को सहना है
अपने अपने झूठ की गठरी
है हर एक के काँधे पर
अपने अपने सच का सबको
राज़ छुपाये रखना है

अपने अपने हिस्से का ग़म यहाँ हर किसी को सहना है

अपनी यादों के मीत कई
हम में हर एक को खोने हैं
अपने अपने हिस्से के शव
हम सबको ख़ुद ही ढोने हैं
दिल, दिमाग और आत्मा में
बाँट के थोड़ा थोड़ा सा
अपने अपने बोझ के संग
सबको जिंदा रहना है

अपने अपने हिस्से का ग़म यहाँ हर किसी को सहना है

कभी दिया किसी को थोड़ा भी
कभी लिया किसी से थोड़ा भी
कभी छीना है कुछ लालच में
कभी हाथों को है जोड़ा भी
अपने पुण्यों का कुछ अमृत
चाहे ना भी हाथ लगे
अपने पापों का स्वाद मगर
हम सभी को चखते रहना है

अपने अपने हिस्से का ग़म यहाँ हर किसी को सहना है

दर्द को भूलें, चाहे छुपायें
चाहे जितना जज़्ब करें
आंसू लेकर आँखों में
फिर भी  हँसते रहना है
रुकने वाला पत्थर बन कर
राहों में खो जाता है
पीड़ाएं अपनी साथ लिये
बस चलते ही रहना है

अपने अपने हिस्से का ग़म यहाँ हर किसी को सहना है |


- योगेश शर्मा