03 अक्तूबर 2010

'अरमानों का दरख़्त'


मेरे दिल में अरमानों का
बहुत बड़ा सा इक दरख़्त है
उस पर ढेरों टंगे हैं सपने 
जिनके पकने में अभी वक्त है 

वो सपने जो मैंने देखे
वैसे जैसे सबने देखे
कभी सोते कभी जागते हुए 
जाने कितने सपने देखे 
कुछ मीठे, प्यारे से और कुछ
होश उड़ाते सपने देखे
रोज़  नये सपने कुछ बोये
देखे सपने फिर से देखे

कई सपने पूरे भी हो गये
और कबके यादों में खो गये
बाकी कुछ आँखों के रस्ते
यूं ही कभी छलक आते हैं
वो भीतर अब भी सांस ले रहे 
मुझको ये बतला जाते हैं
मैं पोंछ के इनको फिर अपनी 
आँखों मैं भर लेता हूँ
इक रोज़ इन्हें कर लूँगा पूरा 
वादा ख़ुद से कर लेता हूँ

मेरे दिल में अरमानों का
बहुत बड़ा सा इक दरख़्त है
उस पर ढेरों टंगे हैं सपने
जिनके पकने में अभी वक्त है


- योगेश शर्मा