31 अक्तूबर 2010

'चढ़ते सूरज को सजदे लाख़ करो'




चढ़ते सूरज को सजदे लाख़ करो
डूबते दिन से बेरुखी न करो 
खिलखिला लो नये चिरागों संग
पिघली शमों से दिल्लगी न करो 

धूप उजली या दौर ऐ गर्दिश हो
अपने साए जुदा करते नहीं
वक्त के साथ बदल लो नज़रे
ख़ुद को इतना ख़ुदा करते नहीं

कोई भी दिन हो कोई हो मौसम 
हर नये सूरज की शाम हो जाए
वक्त की ख़ास बात इतनी है 
न जाने कब ये आम हो  जाए 

और कब जाने नसीब की सिलवट
वक्त के हाथों  पलों में मिट जाए  
रोशनी उसकी ही कोख़ से उपजे
रात जितनी भी बाँझ कहलाये  


खिलते गुंचों से गुलशनों को भरो 
सूखे पेड़ों को काटते न फिरो
चढ़ते सूरज को सजदे लाख़ करो
डूबते दिन से बेरुखी न करो

खिलखिला लो नये चिरागों संग
पिघली  शमों  से दिल्लगी न करो |



- योगेश शर्मा